रविवार, 11 जून 2017

ना जानें क्युं.....

ना जानें क्युं.....
कुछ दिनों से मैंने कुछ भी लिखा ही नहीं,
ज़िम्मेदारी के आगे मुझे कुछ दिखा ही नही।
अपने शौक को धीरे-धीरे मार रहा हूँ मैं,
जाने क्यों किसी की ज़िद के आगे हार रहा हूँ मैं,
कागज़ पर ही अपने अहसास उतार सकता था मैं,
किसी से बिन कहे सदिया गुज़ार सकता था मैं,
कौन सुनेगा मेरी, यहाँ वक़्त किसके पास हैं?
बस कलम और कागज़, इन्ही से मुझे आस है।
क्यों इनका साथ भी अब मुझसे छूट रहा हैं।
सच कहूं लगता हैं मेरे अंदर कुछ टूट रहा है।
जाने क्युं कोई मुझसे रुठ रहा है।

श्याम...

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